उस से मिला तो दिल मेंरा सरशार हो गया
और फिर बिछड़ के ख़ुद से ही बेज़ार हो गया,
कौड़ी के भाव बिकता है इस दौर में ज़मीर
इंसान का वजूद ही बाज़ार हो गया,
रिश्ते हवस की आग में ऐसे जले के बस
अब तो यक़ीन अपनों पे दुश्वार हो गया,
हिर्स ओ हवस की आग थी हर सू जली हुई
लेकिन ज़मीर मेरा मददगार हो गया,
पत्थर की चोट सह गया कुछ भी हुआ नहीं
लफ़्ज़ों का तीर दिल के मेंरे पार हो गया,
आँखों से तेरी याद का सावन बरस पड़ा
सपना मेंरी हयात का साकार हो गया..!!
~इरशाद अज़ीज़
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