फूल ख़ुश्बू से जुदा है अब के

फूल ख़ुश्बू से जुदा है अब के
यारो ये कैसी हवा है अब के ?

दोस्त बिछड़े हैं कई बार मगर
ये नया दाग़ खुला है अब के,

पत्तियाँ रोती हैं सर पीटती हैं
क़त्ल ए गुल आम हुआ है अब के,

शफ़क़ी हो गई दीवार ए ख़याल
किस क़दर ख़ून बहा है अब के,

मंज़र ए ज़ख़्म ए वफ़ा किस को दिखाएँ
शहर में क़हत ए वफ़ा है अब के,

वो तो फिर ग़ैर थे लेकिन यारो
काम अपनों से पड़ा है अब के,

क्या सुनें शोर ए बहाराँ नासिर
हम ने कुछ और सुना है अब के..!!

~नासिर काज़मी

मुमकिन नहीं मता ए सुख़न मुझ से छीन ले

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