हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है

हम अहल ए दिल का समझिए क़रार बाक़ी है
कहीं कोई जो मोहब्बत शि’आर बाक़ी है,

खुली ही रह गईं बीमार ए हिज्र की आँखें
हयात बीत गई इंतिज़ार बाक़ी है,

तबाहियों के सिले में सुकून ए दिल के लिए
तसव्वुर ए निगह ए शर्मसार बाक़ी है,

लहू के फूल खिले हैं रविश रविश देखो
मेरे चमन में अभी तक बहार बाक़ी है,

अगर इधर से कोई कारवाँ नहीं गुज़रा
तो फिर ये राह में कैसा ग़ुबार बाक़ी है ?

सलीब ओ दार उसी की तो सुर्ख़ियाँ हैं रईस
वो दास्ताँ जो सर ए कू ए यार बाक़ी है..!!

~रईस रामपुरी
कम मयस्सर हो जो होती है उसी की क़ीमत

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