हुई हम से ये नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे
ज़मीं की ख़ाक हो कर आसमाँ से दिल लगा बैठे,
हुआ ख़ून ए तमन्ना उस का शिकवा क्या करें तुम से
न कुछ सोचा न कुछ समझा जिगर पर तीर खा बैठे,
ख़बर की थी गुलिस्तान ए मोहब्बत में भी ख़तरे हैं
जहाँ गिरती है बिजली हम उसी डाली पे जा बैठे,
न क्यूँ अंजाम ए उल्फ़त देख कर आँसू निकल आएँ
जहाँ को लूटने वाले ख़ुद अपना घर लुटा बैठे..!!
~शकील बदायूनी

























