ग़म हर एक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं
ग़म हर एक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं अब्र उठे और बरस जाए ज़रूरी तो नहीं, बर्क़
Shayari
ग़म हर एक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं अब्र उठे और बरस जाए ज़रूरी तो नहीं, बर्क़
झूठी ही तसल्ली हो कुछ दिल तो बहल जाए धुंदली ही सही लेकिन एक शम्अ तो जल जाए,
ग़म ए हिज्राँ से ज़रा यूँ भी निभाई जाए महफ़िल ए ग़ैर सही आज सजाई जाए, इख़्तिलाफ़ात की
फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मर रही तू कहाँ आते आते ? न जाना कि
आप का एतिबार कौन करे रोज़ का इंतिज़ार कौन करे ? ज़िक्र ए मेहर ओ वफ़ा तो हम
उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं बाइस ए तर्क ए मुलाक़ात बताते भी नहीं, मुंतज़िर
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया, किसी तरह जो न उस
हर चंद जागते हैं पर सोए हुए से हैं सब अपने अपने ख़्वाबों में खोए हुए से हैं,
और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी उस के रहे हो के हम जिस से
हर एक झोंका नुकीला हो गया है फ़ज़ा का रंग नीला हो गया है, अभी दो चार ही