ग़म हर एक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं

gam har ek aankh ko chhalkaaye zaruri to nahin

ग़म हर एक आँख को छलकाए ज़रूरी तो नहीं अब्र उठे और बरस जाए ज़रूरी तो नहीं, बर्क़

झूठी ही तसल्ली हो कुछ दिल तो बहल जाए

jhuthi hi tasalli ho kuch dil to bahal jaaye

झूठी ही तसल्ली हो कुछ दिल तो बहल जाए धुंदली ही सही लेकिन एक शम्अ तो जल जाए,

ग़म ए हिज्राँ से ज़रा यूँ भी निभाई जाए

gam e hizraan se zara yun bhi nibhaai jaaye

ग़म ए हिज्राँ से ज़रा यूँ भी निभाई जाए महफ़िल ए ग़ैर सही आज सजाई जाए, इख़्तिलाफ़ात की

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

fire raah se wo yahan aate aate

फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मर रही तू कहाँ आते आते ? न जाना कि

आप का एतिबार कौन करे

aap ka aitibar kaun kare

आप का एतिबार कौन करे रोज़ का इंतिज़ार कौन करे ? ज़िक्र ए मेहर ओ वफ़ा तो हम

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

uzr aane me bhi hai aur bulaate bhi nahin

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं बाइस ए तर्क ए मुलाक़ात बताते भी नहीं, मुंतज़िर

ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया

gazab kiya tere waade pe aitibar kiya

ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया, किसी तरह जो न उस

हर चंद जागते हैं पर सोए हुए से हैं

har chand jaagte hai par soye hue se hai

हर चंद जागते हैं पर सोए हुए से हैं सब अपने अपने ख़्वाबों में खोए हुए से हैं,

और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी

aur koi chaara na tha aur koi surat na thi

और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी उस के रहे हो के हम जिस से

हर एक झोंका नुकीला हो गया है

har ek jhoka nukila ho gaya

हर एक झोंका नुकीला हो गया है फ़ज़ा का रंग नीला हो गया है, अभी दो चार ही