सारे भूले बिसरों की याद आती है
सारे भूले बिसरों की याद आती है एक ग़ज़ल सब ज़ख़्म हरे कर जाती है, पा लेने की
Shayari
सारे भूले बिसरों की याद आती है एक ग़ज़ल सब ज़ख़्म हरे कर जाती है, पा लेने की
कितने अख़बार फ़रोशों को सहाफ़ी लिखा ना मुकम्मल को भी ख़ादिम ने इज़ाफ़ी लिखा, तू ने भूले से
पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं इस ज़माने के कई मीर मतब कर रहे हैं,
झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया एक तरह से ये भी अच्छा हो गया, उस ने एक जादू
दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है तो क्या जुदाई की राह हमवार हो रही है
फ़राज़ ए इश्क़ तेरी इंतिहा नहीं हुए हम किसी पे क़र्ज़ थे लेकिन अदा नहीं हुए हम, तेरी
रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे, चाँद सितारे गोद में आ कर
थोड़ा सा माहौल बनाना होता है वर्ना किसी के साथ ज़माना होता है, सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म
सफ़र से लौट जाना चाहता है परिंदा आशियाना चाहता है, कोई स्कूल की घंटी बजा दे ये बच्चा
अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए अब मेरे पास ख़ज़ाना है लुटाने के लिए, ऐसी दफ़अ