हाए क्या हाल कर लिया दिल का
हाए क्या हाल कर लिया दिल का ज़ख़्म अब तक नहीं सिया दिल का, आ के सूरत दिखा
Shayari
हाए क्या हाल कर लिया दिल का ज़ख़्म अब तक नहीं सिया दिल का, आ के सूरत दिखा
हरी भरी थी टहनी सुर्ख़ गुलाब की भी अजब कहानी थी सूखे तालाब की भी, आँख में एक
जब आफ़्ताब न निकला तो रौशनी के लिए जला के हम ने परिंदे फ़ज़ा में छोड़ दिए, तमाम
लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के वही तो दिन थे तेरे खेलने के खाने के,
दरिया कभी एक हाल में बहता न रहेगा रह जाऊँगा मैं और कोई मुझ सा न रहेगा, आसेब
मेरी ख़ातिर देर न करना और सफ़र करते जाना लेकिन छोड़ के जाने वालो एक नज़र करते जाना,
जज़्बा ए शौक़ को इस तौर उभारा जाए हम जिधर जाएँ उधर उन का नज़ारा जाए, आपसी रिश्तों
मैं ने कब अपनी वफ़ाओं का सिला माँगा था एक तबस्सुम ही तेरा बहर ए ख़ुदा माँगा था,
ज़बाँ का पास है तो क़ौल सब निभाने हैं अगर मुकरने पे आऊँ तो सौ बहाने हैं, तीर
रंग हवा से छूट रहा है मौसम ए कैफ़ ओ मस्ती है फिर भी यहाँ से हद्द ए