ख़ाकज़ादे ख़ाक में या ख़ाक पर हैं आज भी
ख़ाकज़ादे ख़ाक में या ख़ाक पर हैं आज भी सामने एक कूज़ागर के चाक पर हैं आज भी,
Shayari
ख़ाकज़ादे ख़ाक में या ख़ाक पर हैं आज भी सामने एक कूज़ागर के चाक पर हैं आज भी,
ये कैसा काम ऐ दस्त ए मसीह कर डाला जो दिल का ज़ख़्म था वो ही सहीह कर
राहतों के धोके में इज़्तिराब ढूँढे हैं हम ने अपनी ख़ातिर ही ख़ुद अज़ाब ढूँढे हैं, ये तो
क़यामत वक़्त से पहले गुज़र जाए तो अच्छा हो नज़र कुछ देर जल्वों पर ठहर जाए तो अच्छा
जब भी उन के हमें अंदाज़ ए नज़र याद आए दिल पे एक चोट लगी दर्द ए जिगर
मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दा दार ए राज़ होती है जो दिल पर चोट लगती है वो बे
आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो पाँव जुलते हैं तो फिर आग पे चलते क्यूँ
तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है लेकिन ये लग रहा है कि तू मेरे
दूर नज़रों से जो हो रहे हैं अभी एक दिन वो नज़ारे पलट आएँगे ग़म का सैलाब जिस
ग़म की अँधेरी रात की जाने सहर न आए क्यों पहरों जले किसी का दिल ज़ख़्म उभर न