ख़ुशबू गुलों में तारों में ताबिंदगी नहीं

khushboo gulon me taaron

ख़ुशबू गुलों में तारों में ताबिंदगी नहीं तुम बिन किसी भी शय में कोई दिलकशी नहीं, जब तुम

जहाँ ग़म है न अब कोई ख़ुशी है

jahan gam hai na

जहाँ ग़म है न अब कोई ख़ुशी है मोहब्बत उस जगह पर आ गई है, जिसे देखो उसे

मुश्किल में है जान बहुत

mushkil me hai jaan

मुश्किल में है जान बहुत जान है अब हैरान बहुत,   उस पत्थर दिल इंसाँ पर होते रहे

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में

lagta nahin hai dil

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम ए ना पाएदार में, इन

कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया

koshish ke bavjood ye

कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया हर काम में हमेशा कोई काम रह गया, छोटी थी उम्र

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है

koi hindu koi muslim

कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है, इतनी ख़ूँ-ख़ार

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा

kahan aa ke rukne

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा वो जो मिल गया उसे याद

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है

zara saa qatara kahin

ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है समुंदरों ही के लहजे में बात करता है, खुली छतों

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता

dukh apna agar hum

दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता, पहुँचा है

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

wo mere ghar nahin

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता मगर इन एहतियातों से तअ’ल्लुक़ मर नहीं