थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं
थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं वो ख़्वाब हम को हमेशा जगाते रहते हैं, उमीदें जागती
Sad Poetry
थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं वो ख़्वाब हम को हमेशा जगाते रहते हैं, उमीदें जागती
तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो लोगों के इस हुजूम में शामिल नहीं है
जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी ये ज़िंदगी मुझे भी दुश्वार लग रही थी, मुझ
किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते हाँ कोई अहद ओ पैमान नहीं करते, हर दम तेरी माला
कहीं पे जिस्म कहीं पर ख़याल रहता है मोहब्बतों में कहाँ एतिदाल रहता है, फ़लक पे चाँद निकलता
हर घर में कोई तहख़ाना होता है तहख़ाने में एक अफ़्साना होता है, किसी पुरानी अलमारी के ख़ानों
इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही इस पर शिकायतें कि फ़ज़ीलत नहीं रही, बदलेगा क्या
पिछले किसी सफ़र का सितारा न ढूँढ ले फिर से कहीं वो साथ हमारा न ढूँढ ले, जिस
दिल के अंदर एक ज़रा सी बे कली है आज भी जो मेरे अफ़्कार में रस घोलती है
मेरे चेहरे में कोई और ही चेहरा देखे वक़्त माथे की लकीरों में वो ठहरा देखे, सब को