सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया भटक गया तो नया रास्ता निकल आया, मेरे ही नाम
Sad Poetry
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया भटक गया तो नया रास्ता निकल आया, मेरे ही नाम
दरवाज़े के अंदर एक दरवाज़ा और छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और ? कोई अंत
सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले ये जो अब दश्त है दरिया था पहले, जो होता कौन
शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है आइने में तेरा दीदार किया जाना है, हम तसव्वुर
लिख लिख के आँसुओं से दीवान कर लिया है अपने सुख़न को अपनी पहचान कर लिया है, आख़िर
दूर रह कर भी मेरे दिल के पास है तेरी यादों में हर पल का एहसास है, तेरी
रंग मौसम का हरा था पहले पेड़ ये कितना घना था पहले, मैं ने तो बाद में तोड़ा
जो कहीं था ही नहीं उस को कहीं ढूँढना था हम को एक वहम के जंगल में यक़ीं
हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है ये ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है,
दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ,