कितना हसीन था तू कभी कुछ ख़याल कर
कितना हसीन था तू कभी कुछ ख़याल कर अब और अपने आप को मत पाएमाल कर, मरने के
Sad Poetry
कितना हसीन था तू कभी कुछ ख़याल कर अब और अपने आप को मत पाएमाल कर, मरने के
आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था सामने दुश्मन था पर दिल में कोई डर
मैं अपना नाम तेरे जिस्म पर लिखा देखूँ दिखाई देगा अभी बत्तियाँ बुझा देखूँ, फिर उस को पाऊँ
शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख
कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं निकल के घर से न फिर अपने घर में
आग पानी से डरता हुआ मैं ही था चाँद की सैर करता हुआ मैं ही था, सर उठाए
शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं बाज़ार ए आरज़ू से गुज़रता नहीं हूँ मैं, पहचान ही
ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू आ लौट के आ फिर तेरी यादों की तरह
जिस को भी देखो तेरे दर का पता पूछता है क़तरा क़तरे से समुंदर का पता पूछता है,
ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा वहाँ भी रेत का अम्बार होगा, ये सारे शहर में दहशत सी