जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता
जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता फ़ना होते ही लाफ़ानी में मैं तब्दील हो
Poetries
जुदा उस जिस्म से हो कर कहीं तहलील हो जाता फ़ना होते ही लाफ़ानी में मैं तब्दील हो
इस तरह गुम हूँ ख़यालों में कुछ एहसास नहीं कौन है पास मेरे कौन मेरे पास नहीं, दर्द
उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम न पूछ कैसे गुज़रती है तेरे हिज्र की शाम
निगाह ए इल्तिफ़ात अब बदगुमाँ मालूम होती है मेरी हर बात दुनिया को गिराँ मालूम होती है, तड़प
हम तो हर ग़म को जहाँ के ग़म ए जानाँ समझे जब बढ़ा नश्शा तो हम बादा ए
भड़काएँ मेरी प्यास को अक्सर तेरी आँखें सहरा मेरा चेहरा है समुंदर तेरी आँखें, फिर कौन भला दाद
मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा मरूँगा ख़ुद भी तुझे भी कड़ी सज़ा दूँगा, ये तीरगी
तुम दूर हो तो प्यार का मौसम न आएगा अब के बरस बहार का मौसम न आएगा, चूमूँगा
भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे हम आँसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे, हम ही ने
कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे, अपने