घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे
घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे वो गुलाबी कटोरे छलक जाएँगे, हम ने अल्फ़ाज़ को आइना कर
Occassional Poetry
घर से निकले अगर हम बहक जाएँगे वो गुलाबी कटोरे छलक जाएँगे, हम ने अल्फ़ाज़ को आइना कर
दिल करे जब आप का मुझ को रुलाया कीजिए आप ग़म की ये दवा मेरे ख़ुदारा कीजिए, लुत्फ़
अपने लिए रहा कभी उस के रहा ख़िलाफ़ मेरा मिज़ाज सब के लिए एक सा ख़िलाफ़, ऐसे भी
देखे हैं दिल नशीन मनाज़िर हिजाब के होते हैं रंग सैंकड़ों पागल जो ख़्वाब के, ख़ुशबू जिसे समझते
चलिए मुश्किल है अगर जीना तो मर जाते हैं बोझ हम रूह पे अपनी हैं उतर जाते हैं,
जलता रहा मैं रात की तन्हाइयों के साथ और तुम रहे हो सुब्ह की रानाइयों के साथ, ऐ
दिल में बस जान सा मैं रहता हूँ ख़ुद में मेहमान सा मैं रहता हूँ, कितने आबाद दिल
उस से मिला तो दिल मेंरा सरशार हो गया और फिर बिछड़ के ख़ुद से ही बेज़ार हो
चराग़ इश्क़ के दिल में जलाए जाते हैं बड़े ही शौक़ से सदमे उठाए जाते हैं, उन्हें सुकून
बड़ी मुश्किल हैं राहें सुन मोहब्बत की ज़माने में कि पल पल मरना पड़ता है इसे दिल से