जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं, मेरे
Occassional Poetry
जहाँ न तेरी महक हो उधर न जाऊँ मैं मेरी सरिश्त सफ़र है गुज़र न जाऊँ मैं, मेरे
राक्षस था न ख़ुदा था पहले आदमी कितना बड़ा था पहले, आसमाँ खेत समुंदर सब लाल ख़ून काग़ज़
तेरा सच है तेरे अज़ाबों में झूठ लिखा है सब किताबों में, एक से मिल के सब से
कच्चे बख़िये की तरह रिश्ते उधड़ जाते हैं लोग मिलते हैं मगर मिल के बिछड़ जाते हैं, यूँ
कितनी तरकीबें कीं बातिन के लिए नून साकिन मीम साकिन के लिए, मेरे अपने मुझ से जब बरहम
क्या ग़म के साथ हम जिएँ और क्या ख़ुशी के साथ जो दिल को दे सुकून गुज़र हो
तू मुझ को सुन रहा है तो सुनाई क्यूँ नहीं देता ये कुछ इल्ज़ाम हैं मेरे सफ़ाई क्यूँ
दिल ए बरहम की ख़ातिर मुद्दआ कुछ भी नहीं होता अजब हालत है अब शिकवा गिला कुछ भी
किसी भी शय पे आ जाने में कितनी देर लगती है मगर फिर दिल को समझाने में कितनी
है बहुत मूड में इस वक़्त दिल ए ज़ार चलो तुम मेरे साथ चलो और लगातार चलो, भाड़