आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो
आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो पाँव जुलते हैं तो फिर आग पे चलते क्यूँ
Occassional Poetry
आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो पाँव जुलते हैं तो फिर आग पे चलते क्यूँ
तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है लेकिन ये लग रहा है कि तू मेरे
दूर नज़रों से जो हो रहे हैं अभी एक दिन वो नज़ारे पलट आएँगे ग़म का सैलाब जिस
ग़म की अँधेरी रात की जाने सहर न आए क्यों पहरों जले किसी का दिल ज़ख़्म उभर न
हाए क्या हाल कर लिया दिल का ज़ख़्म अब तक नहीं सिया दिल का, आ के सूरत दिखा
हरी भरी थी टहनी सुर्ख़ गुलाब की भी अजब कहानी थी सूखे तालाब की भी, आँख में एक
जब आफ़्ताब न निकला तो रौशनी के लिए जला के हम ने परिंदे फ़ज़ा में छोड़ दिए, तमाम
लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के वही तो दिन थे तेरे खेलने के खाने के,
दरिया कभी एक हाल में बहता न रहेगा रह जाऊँगा मैं और कोई मुझ सा न रहेगा, आसेब
मेरी ख़ातिर देर न करना और सफ़र करते जाना लेकिन छोड़ के जाने वालो एक नज़र करते जाना,