कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे
कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे, अपने
Occassional Poetry
कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे, अपने
इन्सान भूल चुका है इन्सान की क़ीमत बाज़ार में बढ़ गई आज हैवान की क़ीमत, इक्तिदार में आते
ज़िक्र ए शब ए फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी मेरी तरह किसी से मोहब्बत उसे भी थी,
ये दिल ये पागल दिल मेरा क्यूँ बुझ गया आवारगी इस दश्त में एक शहर था वो क्या
उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर हालात की क़ब्रों के ये कतबे भी पढ़ा कर, क्या
दामन पे वो अश्कों की तहरीर नज़र आई हर ग़म में मोहब्बत की तस्वीर नज़र आई, ये फ़स्ल
क्यों न अपनी दास्ताँ बे रब्त अफ़्साना रहे तुम से हम मानूस हो कर ख़ुद से बेगाना रहे,
दिल में हर वक़्त ख़याल ए दर ए जानाना है यानी काबे के मुक़द्दर में सनम ख़ाना है,
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा, तेरा
जब तेरा हुक्म मिला, तर्क ए मुहब्बत कर दी दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर