शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम
शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम ये काम था तुम्हारा मगर कर रहे हैं हम, पीना
Occassional Poetry
शर्मिंदगी में उम्र बसर कर रहे हैं हम ये काम था तुम्हारा मगर कर रहे हैं हम, पीना
अब कहाँ दोस्त मिलें साथ निभाने वाले सब ने सीखे हैं अब आदाब ज़माने वाले, दिल जलाओ या
ये मोहब्बत का फ़साना भी बदल जाएगा वक़्त के साथ ज़माना भी बदल जाएगा, आज कल में कोई
बज़्म ए तकल्लुफ़ात सजाने में रह गया मैं ज़िंदगी के नाज़ उठाने में रह गया, तासीर के लिए
पा ब गिल सब हैं रिहाई की करे तदबीर कौन दस्त बस्ता शहर में खोले मेरी ज़ंजीर कौन
मेरी सारी ज़िंदगी को बे समर उस ने किया उम्र मेरी थी मगर उस को बसर उस ने
जब ख़िलाफ़ ए मस्लहत जीने की नौबत आई थी डूब मरते डूब मरने में अगर दानाई थी, मैं
सदा रहेगी यही रवानी रवाँ है पानी बहाओ इस का है जावेदानी रवाँ है पानी, बहाव में बह
मय ए फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था सुबू किनारे विसाल का चाँद ढल रहा था, वो
हर दम तरफ़ है वैसे मिज़ाज करख़्त का टुकड़ा मेरा जिगर है कहो संग सख़्त का, सब्ज़ान इन