आँख से टूट कर गिरी थी नींद

aankh se tut kar giri thi neend

आँख से टूट कर गिरी थी नींद वो जो मदहोश हो चुकी थी नींद, मेरी आँखों के क्यूँ

नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है

naqaab chehron pe sajaaye hue

नक़ाब चेहरों पे सजाये हुए आ जाते है अपनी करतूत छुपाये हुए आ जाते है, घर निकले कोई

यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि…

yun apni gazalon me na jatata ki

यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि मोहब्बत क्या है गर मिलते तो कर के दिखाता कि मोहब्बत

आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई

ayat e hizr padhi aur rihai paai

आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई हमने दानिस्ता मुहब्बत में जुदाई पाई, जिस्म ओ इस्म था जो

लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे

laai hai kis muqam pe ye zindagi mujhe

लाई है किस मक़ाम पे ये ज़िंदगी मुझे महसूस हो रही है ख़ुद अपनी कमी मुझे, देखो तुम

ख़ुशी ने मुझको ठुकराया है दर्द ओ गम ने पाला है

khushi ne mujhko thukraya hai dard o gam ne pala hai

ख़ुशी ने मुझको ठुकराया है दर्द ओ गम ने पाला है गुलो ने बे रुखी की है तो

दरबार ए वतन में जब एक दिन सब…

darbar e watan me jab ek din sab khaaq nasheen

दरबार ए वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जाएँगे कुछ अपनी सज़ा को पहुँचेंगे,कुछ अपनी जज़ा

सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया

saza pe chhod diya kuch jaza pe chhod diya

सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया हर एक काम को अब मैंने ख़ुदा पे छोड़

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

usko jaate hue dekha tha pukara tha kahan

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ, थी कहाँ

जब भी तुझ को याद किया…

jab bhi tujhko yaad kiya

जब भी तुझ को याद किया ख़ुद को ही नाशाद किया, दिल की बस्ती उजड़ी तो दर्द से