शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई
शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई उसे तो आना था हर हाल में चली आई,
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शिगाफ़ ए ख़ाना ए दिल से ही रौशनी आई उसे तो आना था हर हाल में चली आई,
जो समझाते भी आ कर वाइज़ ए बरहम तो क्या करते हम इस दुनिया के आगे उस जहाँ
आख़िर ग़म ए जानाँ को ऐ दिल बढ़ कर ग़म ए दौराँ होना था इस क़तरे को बनना
एक छोटा सा ख़्वाब था जो पूरा नहीं हुआ वो शख्स मेरा हो कर भी मेरा नहीं हुआ,
हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो
सूरज उस के घर की कोई खिड़की है सुब्ह खुले तो शाम को बँद हो जाती है, नस्ल
क्या अंधेरा है क्या उजाला है ये नज़रिये का बस हवाला है, रंग बस एक ही है दुनिया
जंगलों में जो ख़ुदा तितलियाँ महफ़ूज़ रखे तो ज़माने में वही लड़कियाँ महफ़ूज़ रखे, मैं ने एक फ़स्ल
मुझे यक़ीं है कोई रास्ता तो निकलेगा अगर जो कुछ नहीं निकला ख़ुदा तो निकलेगा, मैं रेगज़ारों में
अपना तुम्हें बनाना था कह कर बना लिया तर्ज़ ए वफ़ा का एक नया दफ़्तर बना लिया, दुनिया