दिल में हर वक़्त ख़याल ए दर ए जानाना है
दिल में हर वक़्त ख़याल ए दर ए जानाना है यानी काबे के मुक़द्दर में सनम ख़ाना है,
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दिल में हर वक़्त ख़याल ए दर ए जानाना है यानी काबे के मुक़द्दर में सनम ख़ाना है,
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा, तेरा
जब तेरा हुक्म मिला, तर्क ए मुहब्बत कर दी दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर
मायूस ए शाम ए ग़म तुझे इस की ख़बर भी है तारीकियों की आड़ में नूर ए सहर
अहल ए दुनिया वाक़िफ़ ए असरार ए पिन्हाँ हो गए दास्तान ए ग़म सुना कर हम पशेमाँ हो
किस को ख़ुशी के साथ ग़म ए दो जहाँ नहीं वो कौन सी बहार है जिस की ख़िज़ाँ
ख़ाकज़ादे ख़ाक में या ख़ाक पर हैं आज भी सामने एक कूज़ागर के चाक पर हैं आज भी,
ये कैसा काम ऐ दस्त ए मसीह कर डाला जो दिल का ज़ख़्म था वो ही सहीह कर
राहतों के धोके में इज़्तिराब ढूँढे हैं हम ने अपनी ख़ातिर ही ख़ुद अज़ाब ढूँढे हैं, ये तो
क़यामत वक़्त से पहले गुज़र जाए तो अच्छा हो नज़र कुछ देर जल्वों पर ठहर जाए तो अच्छा