सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के
Love Poetry
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के
बदला मिज़ाज मैं ने जो अपना हवा के साथ दरिया था मेरे साथ किनारा हवा के साथ, फिर
बे सोज़ ए निहाँ महव ए फ़ुग़ाँ हो नहीं सकता जब तक न लगे आग धुआँ हो नहीं
ग़ैरों के जब भी लुत्फ़ ओ करम याद आ गए अपनों ने जो किए थे सितम याद आ
ग़म ए जानाँ से दिल मानूस जब से हो गया मुझ को हँसी अच्छी नहीं लगती ख़ुशी अच्छी
ऐसा तूफ़ाँ है कि साहिल का नज़ारा भी नहीं डूबने वाले को तिनके का सहारा भी नहीं, की
गेसू रुख़ ए रौशन से वो टलने नहीं देते दिन होते हुए धूप निकलने नहीं देते, आँचल में
दोनों आलम से वो बेगाना नज़र आता है जो तेरे इश्क़ में दीवाना नज़र आता है, इश्क़ ए
मुझे रंज होगा न मौत का अगर ऐसी मौत नसीब हो मेरा दम जो निकले तो ऐ ख़ुदा
आग भी दिल में लगी है और अश्क ए ग़म भी है इश्क़ कहते हैं जिसे शोला भी