तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मेरे दिल से बोझ उतार दो
तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मेरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे
Love Poetry
तुम्हें जब कभी मिलें फ़ुर्सतें मेरे दिल से बोझ उतार दो मैं बहुत दिनों से उदास हूँ मुझे
तेरे आने का धोखा सा रहा है दिया सा रात भर जलता रहा है, अजब है रात से
कभी सुकूँ तो कभी इज़्तिराब जैसा है अब उसका मिलना मिलाना भी ख़्वाब जैसा है, ये तिश्नगी ए
समंद ए शौक़ पे ख़त उस का ताज़ियाना हुआ मिले हुए भी तो उस से हमें ज़माना हुआ,
कटा न कोह ए अलम हम से कोहकन की तरह बदल सका न ज़माना तेरे चलन की तरह,
हमारे हाल से कोई जो बा ख़बर रहता ख़याल उसका हमें भी तो उम्र भर रहता, जिसे भी
करता मैं अब किसी से कोई इल्तिमास क्या मरने का ग़म नहीं है तो जीने की आस क्या
चमन लहक के रह गया घटा मचल के रह गई तेरे बग़ैर ज़िंदगी की रुत बदल के रह
हर शेर से मेरे तेरा पैकर निकल आए मंज़र को हटा कर पस ए मंज़र निकल आए, ये
कुछ इस अदा से वो मेरे दिल ओ नज़र में रहा ब क़ैद ए होश भी मैं आलम