हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा

har ghadi khud se uljhna hai muqaddar mera

हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा, किस

जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में

jitne haramkhor the kurbo jawar me

जितने हरामख़ोर थे क़ुर्बो जवार में परधान बनके आ गए अगली क़तार में, दीवार फाँदने में यूँ जिनका

पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो

pahle janab koi shigufa uchhal do

पहले जनाब कोई शिगूफ़ा उछाल दो फिर कर का बोझ क़ौम की गर्दन डल डाल दो, रिश्वत को

वामपंथी सोच का आयाम है नागार्जुन

vaampanthi soch ka aayaam hai nagarjun

वामपंथी सोच का आयाम है नागार्जुन ज़िंदगी में आस्था का नाम है नागार्जुन, ग्रामगंधी सर्जना, उसमें जुलाहे का

इंद्रधनुषी रंग में महकी हुई तहरीर है

indradhanushi rang me mahki hui tahrir hai

इंद्रधनुषी रंग में महकी हुई तहरीर है अमृता की शायरी एक बोलती तस्वीर है, टूटते रिश्तों की तल्ख़ी

ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है

ye samjhte hain khile hain to fir bikhrna hai

ये समझते हैं खिले हैं तो फिर बिखरना है पर अपने ख़ून से गुलशन में रंग भरना है,

ख़्वाब में कोई मुझ को आस दिलाने बैठा था

khwab me koi mujh ko aas dilane baitha tha

ख़्वाब में कोई मुझ को आस दिलाने बैठा था जागा तो मैं ख़ुद अपने ही सिरहाने बैठा था,

यहाँ तकरार ए साअत के सिवा क्या रह गया है

yahan taqarar e saaat ke siwa kya rah gaya hai

यहाँ तकरार ए साअत के सिवा क्या रह गया है मुसलसल एक हालत के सिवा क्या रह गया

शिकस्त ए ख़्वाब का हमें मलाल क्यूँ नहीं रहा

shikast e khwab ka humen malal kyun nahi raha

शिकस्त ए ख़्वाब का हमें मलाल क्यूँ नहीं रहा बिछड़ गए तो फिर तिरा ख़याल क्यूँ नहीं रहा

बताता है मुझे आईना कैसी बे रुख़ी से

batata hai mujhe aaeena kaisi be rukhi se

बताता है मुझे आईना कैसी बे रुख़ी से कि मैं महरूम होता जा रहा हूँ रौशनी से, किसे