करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी
करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी रुस्वाई भी लगती नहीं रुस्वाई हमारी, हम देख के दुनिया भी
Love Poetry
करता है कोई अब भी पज़ीराई हमारी रुस्वाई भी लगती नहीं रुस्वाई हमारी, हम देख के दुनिया भी
चश्म देखूँ न मैं उस की न ही अबरू देखूँ फिर वो क्या शय है जिसे दुनिया में
वो आ के बैठे थे जिस वक़्त आशियाने में अमीर झाँक रहे थे ग़रीब ख़ाने में, हज़ार क़ाफ़िले
ज़िंदगी ऐसे चल रही है दोस्त जैसे मय्यत निकल रही है दोस्त, आज जाना है ग़म की महफ़िल
आँख से कैसे कहूँ अब भी अंधेरा देखे मुद्दतें बीत गईं धूप का जल्वा देखे, दो गिलासों में
तू तो तन्हा सर ए बाज़ार निकल जाता है देखते देखते माहौल बदल जाता है, तुम ने हर
तू मुझे याद करे ऐसा तरीक़ा निकले मेरी यकतरफ़ा मोहब्बत का नतीजा निकले, तेरी आँखों में दिखाई दे
दिल किसी का न हुआ एक ख़रीदार के बाद यहाँ लोग बाज़ार लगा लेते हैं बाज़ार के बाद,
रह रह के याद आती है उस शर्मसार की बे इख़्तियारी देख मेरे इख़्तियार की, डर है कि
हम एक रोज़ उस को भुलाने निकल गए जब आए लौट कर तो ज़माने निकल गए, एक शख़्स