ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी
ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी दम के दम में अफ़्साना थी मेरी तबाही भी,
Love Poetry
ख़त्म शोर ए तूफ़ाँ था दूर थी सियाही भी दम के दम में अफ़्साना थी मेरी तबाही भी,
चमन है मक़्तल ए नग़्मा अब और क्या कहिए बस एक सुकूत का आलम जिसे नवा कहिए, असीर
ख़ंजर की तरह बू ए समन तेज़ बहुत है मौसम की हवा अब के जुनूँ ख़ेज़ बहुत है,
इस बाग़ में वो संग के क़ाबिल कहा न जाए जब तक किसी समर को मिरा दिल कहा
आ ही जाएगी सहर मतला ए इम्काँ तो खुला न सही बाब ए क़फ़स रौज़न ए ज़िंदाँ तो
अल्फाज़ के झूठे बंधन में आगाज़ के गहरे परों में हर शख्स मुहब्बत करता है, हालाकिं मुहब्बत कुछ
आ निकल के मैदाँ में दो रुख़ी के ख़ाने से काम चल नहीं सकता अब किसी बहाने से,
कहीं बे ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने कई ख़्वाब देख डाले यहाँ मेरी बे ख़ुदी
अहल ए तूफ़ाँ आओ दिल वालों का अफ़्साना कहें मौज को गेसू भँवर को चश्म ए जानाना कहें,
डरा के मौज ओ तलातुम से हम नशीनों को यही तो हैं जो डुबोया किए सफ़ीनों को, शराब