दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो

dayaar e noor me teera shabo ka

दयार ए नूर में तीरा शबों का साथी हो कोई तो हो जो मेरी वहशतों का साथी हो,

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

apni tasveer ko aankhon se

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है एक नज़र मेरी तरफ़ भी तेरा जाता क्या है ?

अहल ए मोहब्बत की मजबूरी बढ़ती जाती है

ahal e mohabbat ki mazburi badhti jati hai

अहल ए मोहब्बत की मजबूरी बढ़ती जाती है मिट्टी से गुलाब की दूरी बढ़ती जाती है, मेहराबों से

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया

azaab ye bhi kisi aur pe nahi aaya

अज़ाब ये भी किसी और पर नहीं आया कि एक उम्र चले और घर नहीं आया, उस एक

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

thik hai khud ko ham badalte hai

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं, हो रहा हूँ मैं किस तरह

यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि…

yun apni gazalon me na jatata ki

यूँ अपनी गज़लों में न जताता कि मोहब्बत क्या है गर मिलते तो कर के दिखाता कि मोहब्बत

आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई

ayat e hizr padhi aur rihai paai

आयत ए हिज्र पढ़ी और रिहाई पाई हमने दानिस्ता मुहब्बत में जुदाई पाई, जिस्म ओ इस्म था जो

सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया

saza pe chhod diya kuch jaza pe chhod diya

सज़ा पे छोड़ दिया, कुछ जज़ा पे छोड़ दिया हर एक काम को अब मैंने ख़ुदा पे छोड़

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ

usko jaate hue dekha tha pukara tha kahan

उसको जाते हुए देखा था पुकारा था कहाँ रोकते किस तरह वो शख़्स हमारा था कहाँ, थी कहाँ

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था

dard ab wo nahi rahe jo ae dil e nadaan pahle tha

दर्द अब वो नहीं रहें जो ऐ दिल ए नादां पहले था खुले सर पर मेरे भी कभी