गर हक़ चाहते हो तो फिर जंग लड़ो…

gar haq chahte ho to jang lado guhar lagane se kahan nizam badlega

गर हक़ चाहते हो तो फिर जंग लड़ो गुहार लगाने से कहाँ ये निज़ाम बदलेगा, छाँव ढूँढ़ते हो,

जाने क्यूँ अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते…

jaane kyun ab log khuli kitab nahi hote

जाने क्यूँ अब शर्म से चेहरे गुलाब नहीं होते जाने क्यूँ अब मस्त मौला मिजाज़ नहीं होते, पहले

मुफ़लिसी में दिन बिताते है यहाँ…

muflisi me din bitate hayan fir bhi sapne ham sajate hai yahan

मुफ़लिसी में दिन बिताते है यहाँ फिर भी सपने हम सजाते है यहाँ, मज़हबी बातें उठा कर लोग

झूठी बाते झूठे लोग, सहते रहेंगे सच्चे लोग…

jhuthi baaten jhuthe log sahte rahenge sachche log

झूठी बाते झूठे लोग, सहते रहेंगे सच्चे लोग हरियाली पर बोलेंगे, सावन के सब अँधे लोग, दो कौड़ी

न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले…

naa mili chhanv kahin yun to kai shazar mile

न मिली छाँव कहीं, यूँ तो कई शज़र मिले वीरान ही मिले सफ़र में जो भी शहर मिले,

रौनक तुम्हारे दम से है लैल ओ नहार की…

raunak tumhare dam se hai lail o nahaar ki

रौनक तुम्हारे दम से है लैल ओ नहार की तुम आबरू हो आमद ए फ़सल ए बाहर की,

हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है…

har rishta yahan bas char din ki kahani hai

हर रिश्ता यहाँ बस चार दिन की कहानी है अंज़ाम ए वफ़ा का सिला आँखों से बहता पानी

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से…

talab ki raahon me saare alam naye naye se

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से शजर हजर लोग शहर मौसम नए नए से, चमक

सियाह रात से हम रौशनी बनाते हैं…

Siyah raat se ham raushni banate hai

सियाह रात से हम रौशनी बनाते हैं पुरानी बात को अक्सर नई बनाते हैं, कल एक बच्चे ने

शाख़ से फूल से क्या उस का पता पूछती है…

shakh se fool se kya uska pata puchhti hai

शाख़ से फूल से क्या उसका पता पूछती है या फिर इस दश्त में कुछ और हवा पूछती