अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है

aks har roz kisi gam ka pada karta hai

अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है दिल वो आईना कि चुप चाप तका करता है,

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

ghatti badhti raushniyo ne mujhe

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं मैं किसी पत्थर किसी दीवार का साया नहीं, जाने किन रिश्तों

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

bahut khauf tha jis ka fir wahi

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया मेरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल

चुपचाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो

chupchap sulgata hai diya tum bhi

चुपचाप सुलगता है दिया तुम भी तो देखो किस दर्द को कहते हैं वफ़ा तुम भी तो देखो,

रोज़ कहाँ से कोई नया पन अपने आप में लाएँगे

roz roz kahan se koi naya pan

रोज़ कहाँ से कोई नया पन अपने आप में लाएँगे तुम भी तंग आ जाओगे एक दिन हम

न है बुतकदा की तलब मुझे न हरम के दर की तलाश है

na hai butqada ki talab mujhe

न है बुतकदा की तलब मुझे न हरम के दर की तलाश है जहाँ लुट गया है सुकून

अब तो कोई भी किसी की बात नहीं समझता

ab to koi bhi kisi ki baat nahin

अब तो कोई भी किसी की बात नहीं समझता अब कोई भी किसी के जज़्बात नहीं समझता, अपने

हर एक ने कहा क्यूँ तुझे आराम न आया

har ek ne kaha kyun tujhe

हर एक ने कहा क्यूँ तुझे आराम न आया सुनते रहे हम लब पे तेरा नाम न आया,

ज़बान ए ग़ैर से क्या शरह ए आरज़ू करते

zabaan e gair se kya sharah

ज़बान ए ग़ैर से क्या शरह ए आरज़ू करते वो ख़ुद अगर कहीं मिलता तो गुफ़्तुगू करते, वो

ग़म ए दौराँ ने भी सीखे ग़म ए जानाँ के चलन

gam e dauraan ne bhi sikhe

ग़म ए दौराँ ने भी सीखे ग़म ए जानाँ के चलन वही सोची हुई चालें वही बे साख़्तापन,