आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था
आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था सामने दुश्मन था पर दिल में कोई डर
Life Poetry
आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था सामने दुश्मन था पर दिल में कोई डर
शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख
कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं निकल के घर से न फिर अपने घर में
आग पानी से डरता हुआ मैं ही था चाँद की सैर करता हुआ मैं ही था, सर उठाए
क्यूँ न महकें गुलाब आँखों में ? हम ने रखे हैं ख़्वाब आँखों में, रात आई तो चाँद
शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं बाज़ार ए आरज़ू से गुज़रता नहीं हूँ मैं, पहचान ही
ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू आ लौट के आ फिर तेरी यादों की तरह
जिस को भी देखो तेरे दर का पता पूछता है क़तरा क़तरे से समुंदर का पता पूछता है,
ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा वहाँ भी रेत का अम्बार होगा, ये सारे शहर में दहशत सी
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया भटक गया तो नया रास्ता निकल आया, मेरे ही नाम