ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से

zara see dhoop zara see nami ke aane se

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से मैं जी उठा हूँ ज़रा ताज़गी के आने से,

तेरे ख़याल को ज़ंजीर करता रहता हूँ

tere khyal ko zanjeer karta rahta hoon

तेरे ख़याल को ज़ंजीर करता रहता हूँ मैं अपने ख़्वाब की ताबीर करता रहता हूँ, तमाम रंग अधूरे

देख रहा है दरिया भी हैरानी से

dekh raha hai dariya bhi hairani se

देख रहा है दरिया भी हैरानी से मैं ने कैसे पार किया आसानी से, नदी किनारे पहरों बैठा

क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ

kyun aankhen band kar ke

क्यूँ आँखें बंद कर के रस्ते में चल रहा हूँ क्या मैं भी रफ़्ता रफ़्ता पत्थर में ढल

थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं

thapak thapak ke jinehn hum sulate

थपक थपक के जिन्हें हम सुलाते रहते हैं वो ख़्वाब हम को हमेशा जगाते रहते हैं, उमीदें जागती

तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो

tum jis ko dhoondhte ho ye mahfil nahi hai

तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो लोगों के इस हुजूम में शामिल नहीं है

जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी

jab tak khuli nahin thi asrar lag rahi thi

जब तक खुली नहीं थी असरार लग रही थी ये ज़िंदगी मुझे भी दुश्वार लग रही थी, मुझ

इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही

ilm o hunar se qaum ko ragbat nahin rahi

इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही इस पर शिकायतें कि फ़ज़ीलत नहीं रही, बदलेगा क्या

पिछले किसी सफ़र का सितारा न ढूँढ ले

pichhle kisi safar ka sitara naa dhoondh le

पिछले किसी सफ़र का सितारा न ढूँढ ले फिर से कहीं वो साथ हमारा न ढूँढ ले, जिस

दिल के अंदर एक ज़रा सी बे कली है आज भी

dil ke andar ek zara see be kali hai

दिल के अंदर एक ज़रा सी बे कली है आज भी जो मेरे अफ़्कार में रस घोलती है