ऑफ़िस में भी घर को खुला पाता हूँ मैं
ऑफ़िस में भी घर को खुला पाता हूँ मैं टेबल पर सर रख कर सो जाता हूँ मैं,
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ऑफ़िस में भी घर को खुला पाता हूँ मैं टेबल पर सर रख कर सो जाता हूँ मैं,
इस शहर में कहीं पे हमारा मकाँ भी हो बाज़ार है तो हम पे कभी मेहरबाँ भी हो,
कल रात सूनी छत पे अजब सानेहा हुआ जाने दो यार कौन बताए कि क्या हुआ ? नज़रों
एक लड़का था एक लड़की थी आगे अल्लाह की मर्ज़ी थी, पहला फूल खिला था दिल में लहू
कितना हसीन था तू कभी कुछ ख़याल कर अब और अपने आप को मत पाएमाल कर, मरने के
आँख में दहशत न थी हाथ में ख़ंजर न था सामने दुश्मन था पर दिल में कोई डर
मैं अपना नाम तेरे जिस्म पर लिखा देखूँ दिखाई देगा अभी बत्तियाँ बुझा देखूँ, फिर उस को पाऊँ
शरीफ़े के दरख़्तों में छुपा घर देख लेता हूँ मैं आँखें बंद कर के घर के अंदर देख
कभी तो ऐसा भी हो राह भूल जाऊँ मैं निकल के घर से न फिर अपने घर में
आग पानी से डरता हुआ मैं ही था चाँद की सैर करता हुआ मैं ही था, सर उठाए