ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया
ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया, किसी तरह जो न उस
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ग़ज़ब किया तेरे वादे पे एतिबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया, किसी तरह जो न उस
जाती हुई लड़की को सदा देना चाहिए घर हो तो बुरा क्या है पता देना चाहिए, होंटों के
हर चंद जागते हैं पर सोए हुए से हैं सब अपने अपने ख़्वाबों में खोए हुए से हैं,
और कोई चारा न था और कोई सूरत न थी उस के रहे हो के हम जिस से
हर एक झोंका नुकीला हो गया है फ़ज़ा का रंग नीला हो गया है, अभी दो चार ही
दिन भर के दहकते हुए सूरज से लड़ा हूँ अब रात के दरिया में पड़ा डूब रहा हूँ,
यूँ तो कम कम थी मोहब्बत उस की कम न थी फिर भी रिफ़ाक़त उस की, सारे दुख
अभी तो और भी दिन बारिशों के आने थे करिश्मे सारे उसे आज ही दिखाने थे, हिक़ारतें ही
गुलों के दरमियाँ अच्छी लगी हैं हमें ये तितलियाँ अच्छी लगी हैं, गली में कोई घर अच्छा नहीं
हज़ारों लाखों दिल्ली में मकाँ हैं मगर पहचानने वाले कहाँ हैं ? कहीं पर सिलसिला है कोठियों का