हुई हम से ये नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे
हुई हम से ये नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे ज़मीं की ख़ाक हो कर आसमाँ से दिल
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हुई हम से ये नादानी तेरी महफ़िल में आ बैठे ज़मीं की ख़ाक हो कर आसमाँ से दिल
याद में तेरी जाग जाग के हम रात भर करवटें बदलते हैं हर घड़ी दिल में तेरी उल्फ़त
दुखों में उस के इज़ाफ़ा भी मैं ही करता हूँ और इस कमी का इज़ाला भी मैं ही
ये तेरी ख़ल्क़ नवाज़ी का तक़ाज़ा भी नहीं कहीं दरिया है रवाँ और कहीं क़तरा भी नहीं, अपने
मसअला ख़त्म हुआ चाहता है दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है, कब तलक लोग अंधेरे में रहें
सारे भूले बिसरों की याद आती है एक ग़ज़ल सब ज़ख़्म हरे कर जाती है, पा लेने की
कितने अख़बार फ़रोशों को सहाफ़ी लिखा ना मुकम्मल को भी ख़ादिम ने इज़ाफ़ी लिखा, तू ने भूले से
पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं इस ज़माने के कई मीर मतब कर रहे हैं,
झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया एक तरह से ये भी अच्छा हो गया, उस ने एक जादू
दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है तो क्या जुदाई की राह हमवार हो रही है