मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दा दार ए राज़ होती है
मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दा दार ए राज़ होती है जो दिल पर चोट लगती है वो बे
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मोहब्बत ख़ुद ही अपनी पर्दा दार ए राज़ होती है जो दिल पर चोट लगती है वो बे
आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो पाँव जुलते हैं तो फिर आग पे चलते क्यूँ
तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है लेकिन ये लग रहा है कि तू मेरे
दूर नज़रों से जो हो रहे हैं अभी एक दिन वो नज़ारे पलट आएँगे ग़म का सैलाब जिस
ग़म की अँधेरी रात की जाने सहर न आए क्यों पहरों जले किसी का दिल ज़ख़्म उभर न
हाए क्या हाल कर लिया दिल का ज़ख़्म अब तक नहीं सिया दिल का, आ के सूरत दिखा
हरी भरी थी टहनी सुर्ख़ गुलाब की भी अजब कहानी थी सूखे तालाब की भी, आँख में एक
जब आफ़्ताब न निकला तो रौशनी के लिए जला के हम ने परिंदे फ़ज़ा में छोड़ दिए, तमाम
लगे थे ग़म तुझे किस उम्र में ज़माने के वही तो दिन थे तेरे खेलने के खाने के,
दरिया कभी एक हाल में बहता न रहेगा रह जाऊँगा मैं और कोई मुझ सा न रहेगा, आसेब