शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं
शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं बाज़ार ए आरज़ू से गुज़रता नहीं हूँ मैं, पहचान ही
Hindi Shayari
शर्मिंदा अपनी जेब को करता नहीं हूँ मैं बाज़ार ए आरज़ू से गुज़रता नहीं हूँ मैं, पहचान ही
ऐसे न बिछड़ आँखों से अश्कों की तरह तू आ लौट के आ फिर तेरी यादों की तरह
जिस को भी देखो तेरे दर का पता पूछता है क़तरा क़तरे से समुंदर का पता पूछता है,
ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा वहाँ भी रेत का अम्बार होगा, ये सारे शहर में दहशत सी
सफ़र में अब के अजब तजरबा निकल आया भटक गया तो नया रास्ता निकल आया, मेरे ही नाम
दरवाज़े के अंदर एक दरवाज़ा और छुपा हुआ है मुझ में जाने क्या क्या और ? कोई अंत
सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले ये जो अब दश्त है दरिया था पहले, जो होता कौन
शौक़ की हद को अभी पार किया जाना है आइने में तेरा दीदार किया जाना है, हम तसव्वुर
दूर रह कर भी मेरे दिल के पास है तेरी यादों में हर पल का एहसास है, तेरी
जो कहीं था ही नहीं उस को कहीं ढूँढना था हम को एक वहम के जंगल में यक़ीं