जहाँ ग़म है न अब कोई ख़ुशी है
जहाँ ग़म है न अब कोई ख़ुशी है मोहब्बत उस जगह पर आ गई है, जिसे देखो उसे
Ghazals
जहाँ ग़म है न अब कोई ख़ुशी है मोहब्बत उस जगह पर आ गई है, जिसे देखो उसे
नज़रों का मोहब्बत भरा पैग़ाम बहुत है मजबूर ए वफ़ा के लिए इनआम बहुत है, कुछ बादा ओ
जब हम हुदूद ए दैर ओ हरम से गुज़र गए हर सम्त उन का जल्वा अयाँ था जिधर
दिल में बंदों के बहुत ख़ौफ़ ए ख़ुदा था पहले ये ज़माना कभी इतना न बुरा था पहले,
हर फ़ित्ना ओ तफ़रीक़ से बेज़ार हैं हम लोग साइल हैं मोहब्बत के तलबगार हैं हम लोग, हिन्दू
मुसलमाँ और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दोस्तान ? मैं उस को ढूँढ रहा हूँ, मेंरे बचपन
मुश्किल में है जान बहुत जान है अब हैरान बहुत, उस पत्थर दिल इंसाँ पर होते रहे
अगर है मंज़ूर ये कि होवे हमारे सीने का दाग़ ठंडा तो आ लिपटिए गले से ऐ जाँ
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में किस की बनी है आलम ए ना पाएदार में, इन
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया हर काम में हमेशा कोई काम रह गया, छोटी थी उम्र