कोई दुश्मन भला भाता किसे है
कोई दुश्मन भला भाता किसे है बनाना दोस्त भी आता किसे है फ़ना हो कर बक़ा पाता है
Ghazals
कोई दुश्मन भला भाता किसे है बनाना दोस्त भी आता किसे है फ़ना हो कर बक़ा पाता है
हम तो शायद यहाँ के थे ही नहीं इस ज़मीं आसमाँ के थे ही नहीं, तन्हा तन्हा ही
अपना ख़ुर्शीद और अपना ही क़मर पैदा कर तू मोहब्बत का शजर है तो समर पैदा कर, हर
बदहवासी बदगुमानी बेनियाज़ी आप की मुश्किलों में डाल देगी ज़िंदगानी आप की, देख कर हैरत है सब को
चर्चा है आज बस यही हर एक ज़बान पर जल्दी बनेगी फ़िल्म मेंरी दास्तान पर, मैंने जमा के
दीदार माहताब का शब भर नहीं हुआ रौशन मेंरे नसीब का अख़्तर नहीं हुआ, हर दम वही हुआ
हिज्र की धूप में छाओं जैसी बातें करते हैं आँसू भी तो माओं जैसी बातें करते हैं, रस्ता
हर सू जहाँ में शाम ओ सहर ढूँढते हैं हम जो दिल में घर करे वो नज़र ढूँढते
चराग़ ख़ुद ही बुझाया बुझा के छोड़ दिया वो ग़ैर था उसे अपना बना के छोड़ दिया, हज़ार
कुटिया में कौन आएगा इस तीरगी के साथ अब ये किवाड़ बंद करो ख़ामोशी के साथ, साया है