तमाम शहर की ख़ातिर चमन से आते हैं
तमाम शहर की ख़ातिर चमन से आते हैं हमारे फूल किसी के बदन से आते हैं, हम उन
Ghazals
तमाम शहर की ख़ातिर चमन से आते हैं हमारे फूल किसी के बदन से आते हैं, हम उन
तेरा भला हो तू जो समझता है मुझ को ग़ैर आँखों पे आँखें रख तो कि कर लूँ
तुझ से मिल कर तो ये लगता है कि ऐ अजनबी दोस्त तू मेंरी पहली मोहब्बत थी मेंरी
तेरे हुस्न की ख़ैर बना दे एक दिन का सुल्तान मुझे आँखों को बस देखने दे और होंठों
ख़ुशी देखते हैं न ग़म देखते हैं हम अंदाज़ ए अहल ए करम देखते हैं, हर एक शय
आए हैं सराए में तो घर जाएँगे क्या है हम लोग किसी रोज़ गुज़र जाएँगे क्या है हम
माशूक़ अजब चीज़ है दे जिसको ख़ुदा दे हँसते को रुला दे यही रोते को हँसा दे, मशहूर
कुछ अब की बार तो ऐसा बिफर गया पानी बहा के ले गया हर शय जिधर गया पानी,
फ़क़ीराना तबीअत थी बहुत बेबाक लहजा था कभी मुझ में भी हँसता खेलता एक शख़्स रहता था, बगूले
हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही किस ने तोड़ा दिल हमारा ये कहानी