मुझे रंज होगा न मौत का अगर ऐसी मौत नसीब हो
मुझे रंज होगा न मौत का अगर ऐसी मौत नसीब हो मेरा दम जो निकले तो ऐ ख़ुदा
Ghazals
मुझे रंज होगा न मौत का अगर ऐसी मौत नसीब हो मेरा दम जो निकले तो ऐ ख़ुदा
आग भी दिल में लगी है और अश्क ए ग़म भी है इश्क़ कहते हैं जिसे शोला भी
यार के सामने अग़्यार बुरे लगते हैं फूल होता है जहाँ ख़ार बुरे लगते हैं रात के फूल
आएगा कोई चल के ख़िज़ाँ से बहार में सदियाँ गुज़र गई हैं इसी इंतिज़ार में, छिड़ते ही साज़
नील गगन में तैर रहा है उजला उजला पूरा चाँद माँ की लोरी सा बच्चे के दूध कटोरे
यूँ लग रहा है जैसे कोई आस पास है वो कौन है जो है भी नहीं और उदास
सफ़र को जब भी किसी दास्तान में रखना क़दम यक़ीन में मंज़िल गुमान में रखना, जो साथ है
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो यूँ भी न कर सको तो फिर घर में ख़ुदा
उस को खो देने का एहसास तो कम बाक़ी है जो हुआ वो न हुआ होता ये ग़म
मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ दुनिया के कारोबार में हूँ भी नहीं भी हूँ,