किसी भी शय पे आ जाने में कितनी देर लगती है
किसी भी शय पे आ जाने में कितनी देर लगती है मगर फिर दिल को समझाने में कितनी
Ghazals
किसी भी शय पे आ जाने में कितनी देर लगती है मगर फिर दिल को समझाने में कितनी
है बहुत मूड में इस वक़्त दिल ए ज़ार चलो तुम मेरे साथ चलो और लगातार चलो, भाड़
पहली बार आई दुल्हन ससुराल वो भी बेनक़ाब शर्म आँखों से झलकती है न है चेहरे पे आब,
एक बीवी कई साले हैं ख़ुदा ख़ैर करे खाल सब खींचने वाले हैं ख़ुदा ख़ैर करे, तन के
चौथी शादी कर के मुल्ला जी बहुत शादाँ हुए अपनी क़िस्मत की बुलंदी देख कर नाज़ाँ हुए, यूँ
जैसा हूँ स्वीकार तुम्हीं तो करती हो बिना शर्त के प्यार तुम्हीं तो करती हो, अपनी दिलकश अदा
ज़ख़्मों ने मुझ में दरवाज़े खोले हैं मैंने वक़्त से पहले टाँके खोले हैं, बाहर आने की भी
वैसे मैंने दुनिया में क्या देखा है तुम कहते हो तो फिर अच्छा देखा है, मैं उस को
मैंने ये कब कहा है कि वो मुझ को तन्हा नहीं छोड़ता छोड़ता है मगर एक दिन से
न नींद और न ख़्वाबों से आँख भरनी है कि उस से हम ने तुझे देखने की करनी