तेरी जानिब अगर चले होते
तेरी जानिब अगर चले होते हम न यूँ दर ब दर हुए होते, सारी दुनिया है मेरी मुट्ठी
Ghazals
तेरी जानिब अगर चले होते हम न यूँ दर ब दर हुए होते, सारी दुनिया है मेरी मुट्ठी
कितनी ज़ुल्फ़ें उड़ीं कितने आँचल उड़े चाँद को क्या ख़बर कितना मातम हुआ कितने आँसू बहे चाँद को
गली में दर्द के पुर्ज़े तलाश करती थी मेरे ख़ुतूत के टुकड़े तलाश करती थी, कहाँ गई वो
हम ने जो दीप जलाए हैं तेरी गलियों में अपने कुछ ख़्वाब सजाए हैं तेरी गलियों में, जाने
वो ख़ुश अंदाज़ ओ ख़ुश अतवार कहीं मिलते हैं ज़िंदगी तेरे परस्तार कहीं मिलते हैं, जैसे एक मोड़
इश्क़ से अक़्ल का फ़ुक़्दान ख़रीदा हम ने और वो भी अलल ऐलान ख़रीदा हम ने, हम ने
दुश्वार है इस अंजुमन आरा को समझना तन्हा न कभी तुम दिल ए तन्हा को समझना, हो जाए
वही बेबाकी ए उश्शाक़ है दरकार अब भी है वही सिलसिला ए आतिश ओ गुलज़ार अब भी, अब
मआल ए अहल ए ज़मीं बर सर ए ज़मीं आता जो बे यक़ीन हैं उन को भी फिर
गुज़र गई है अभी साअत ए गुज़िश्ता भी नज़र उठा कि गुज़र जाएगा ये लम्हा भी, बहुत क़रीब