अक़्ल की ऐसी ताबेदारी है
अक़्ल की ऐसी ताबेदारी है ख़्वाहिशों में भी इंकिसारी है, चल पड़ी है अजल की राहों पर ज़िंदगी
Ghazals
अक़्ल की ऐसी ताबेदारी है ख़्वाहिशों में भी इंकिसारी है, चल पड़ी है अजल की राहों पर ज़िंदगी
हैं मेरी परवाज़ के तेवर नए साथ मेरे देखिए मंज़र नए, एक पुराने मयकदे में तिश्नगी ढूँढती है
कोई काबा न कलीसा न सनम मेरा है एक नए ख़्वाब की धरती पे क़दम मेरा है, सारी
अब आप रह ए दिल जो कुशादा नहीं रखते हम भी सफ़र ए जाँ का इरादा नहीं रखते,
इस ख़ाकदाँ में अब तक बाक़ी हैं कुछ शरर से दामन बचा के गुज़रो यादों की रहगुज़र से,
गूँजता है नाला ए महताब आधी रात को टूट जाते हैं सुहाने ख़्वाब आधी रात को, भागते सायों
पर्दा ए शब की ओट में ज़ोहरा जमाल खो गए दिल का कँवल बुझा तो शहर तीरा ओ
दिल के वीराने में एक फूल खिला रहता है कोई मौसम हो मेरा ज़ख़्म हरा रहता है, शब
मान ले अब भी मेरी जान ए अदा दर्द न चुन काम आती नहीं फिर कोई दुआ दर्द
डूबता साफ़ नज़र आया किनारा कोई दोस्त फिर भी कश्ती से नहीं हम ने उतारा कोई दोस्त, जब