किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते
किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते हाँ कोई अहद ओ पैमान नहीं करते, हर दम तेरी माला
Ghazals
किस लम्हे हम तेरा ध्यान नहीं करते हाँ कोई अहद ओ पैमान नहीं करते, हर दम तेरी माला
कहीं पे जिस्म कहीं पर ख़याल रहता है मोहब्बतों में कहाँ एतिदाल रहता है, फ़लक पे चाँद निकलता
हर घर में कोई तहख़ाना होता है तहख़ाने में एक अफ़्साना होता है, किसी पुरानी अलमारी के ख़ानों
इल्म ओ हुनर से क़ौम को रग़बत नहीं रही इस पर शिकायतें कि फ़ज़ीलत नहीं रही, बदलेगा क्या
पिछले किसी सफ़र का सितारा न ढूँढ ले फिर से कहीं वो साथ हमारा न ढूँढ ले, जिस
दिल के अंदर एक ज़रा सी बे कली है आज भी जो मेरे अफ़्कार में रस घोलती है
मेरे चेहरे में कोई और ही चेहरा देखे वक़्त माथे की लकीरों में वो ठहरा देखे, सब को
कहता रहे ज़माना गुनहगार ज़िंदगी कुछ लोग जी रहे हैं मज़ेदार ज़िंदगी, किरदार अपना अपना निभाते हैं सब
हर किसी की है ज़बानी दोस्ती क्या किसी की आज़मानी दोस्ती, थे मुसाफ़िर दो अलग रस्तों के हम
मिल के बैठें तो हम कहीं पहले बाँट लेते हैं क्यूँ ज़मीं पहले ? होगा तेरा भी एतिबार