रंग मौसम का हरा था पहले
रंग मौसम का हरा था पहले पेड़ ये कितना घना था पहले, मैं ने तो बाद में तोड़ा
General Poetry
रंग मौसम का हरा था पहले पेड़ ये कितना घना था पहले, मैं ने तो बाद में तोड़ा
जो कहीं था ही नहीं उस को कहीं ढूँढना था हम को एक वहम के जंगल में यक़ीं
हर एक साँस ही हम पर हराम हो गई है ये ज़िंदगी तो कोई इंतिक़ाम हो गई है,
दिन को दिन रात को मैं रात न लिखने पाऊँ उनकी कोशिश है कि हालात न लिखने पाऊँ,
यूँ देखिए तो आँधी में बस एक शजर गया लेकिन न जाने कितने परिंदों का घर गया, जैसे
अब छत पे कोई चाँद टहलता ही नहीं है दिल मेरा मगर पहलू बदलता ही नहीं है, कब
मैं जिस जगह भी रहूँगा वहीं पे आएगा मेरा सितारा किसी दिन ज़मीं पे आएगा, लकीर खींच के
सड़क पे दौड़ते महताब देख लेता हूँ मैं चलता फिरता हुआ ख़्वाब देख लेता हूँ, मेरी नज़र से
कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है ऐरों ग़ैरों का एहसान उठाना पड़ता है, टेढ़े मेढ़े रस्तों पर
जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है कोई तासीर तो मौजूद मेरी ख़ाक में है,