दुखों में उस के इज़ाफ़ा भी मैं ही करता हूँ
दुखों में उस के इज़ाफ़ा भी मैं ही करता हूँ और इस कमी का इज़ाला भी मैं ही
General Poetry
दुखों में उस के इज़ाफ़ा भी मैं ही करता हूँ और इस कमी का इज़ाला भी मैं ही
ये तेरी ख़ल्क़ नवाज़ी का तक़ाज़ा भी नहीं कहीं दरिया है रवाँ और कहीं क़तरा भी नहीं, अपने
मसअला ख़त्म हुआ चाहता है दिल बस अब ज़ख़्म नया चाहता है, कब तलक लोग अंधेरे में रहें
सारे भूले बिसरों की याद आती है एक ग़ज़ल सब ज़ख़्म हरे कर जाती है, पा लेने की
कितने अख़बार फ़रोशों को सहाफ़ी लिखा ना मुकम्मल को भी ख़ादिम ने इज़ाफ़ी लिखा, तू ने भूले से
पेट की आग बुझाने का सबब कर रहे हैं इस ज़माने के कई मीर मतब कर रहे हैं,
झूठ सच्चाई का हिस्सा हो गया एक तरह से ये भी अच्छा हो गया, उस ने एक जादू
दिलों के माबैन शक की दीवार हो रही है तो क्या जुदाई की राह हमवार हो रही है
फ़राज़ ए इश्क़ तेरी इंतिहा नहीं हुए हम किसी पे क़र्ज़ थे लेकिन अदा नहीं हुए हम, तेरी
रिश्तों की दलदल से कैसे निकलेंगे हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे, चाँद सितारे गोद में आ कर