हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता

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हर वक़्त किसी को मुकम्मल नज़ारा नहीं मिलता उम्मीद जब रखो तो कहीं किनारा नहीं मिलता, वफाओं के

हर शख्स का जीना यहाँ आसान नहीं है

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हर शख्स का जीना यहाँ आसान नहीं है मुश्किल से मिले वो जो परेशान नहीं है, हर शख्स

रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर…

रोज़मर्रा वही सब ख़बर

रोज़मर्रा वही सब ख़बर देख कर अब तो पत्थर हुआ ये ज़िगर देखिए, सड़के चलने लगी आदमी रुक

ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा…

zindagi ka bojh uthana padega

ज़िन्दगी का बोझ उठाना पड़ेगा गर ज़िन्दा हो तो दिखाना पड़ेगा, लगने लगे जो मसला ये ज़िन्दगी तो

तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में

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तमाम उम्र कटी उसकी मेज़बानी में बिछड़ गया था कभी जो भरी जवानी में, हमारे होने तलक सब

किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है

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किसी कमज़ोर की जब भी दुआएँ गूँज उठती है अबाबीलों के लश्कर से फज़ाएँ गूँज उठती है, ख़ामोशी

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है

tu-is-qadar-mujhe

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है तुझे अलग से जो सोचू अजीब लगता है, जिसे ना

मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है

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मुश्किल चाहे लाख हो लेकिन एक दिन तो हल होती है ज़िन्दा लोगों की दुनिया में अक्सर हलचल

हमें कुछ पता नहीं है हम क्यूँ बहक रहे हैं ?

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हमें कुछ पता नहीं है हम क्यूँ बहक रहे हैं ? रातें सुलग रही हैं दिन भी दहक

लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ?

lena-dena-hi-kya

लेना देना ही क्या फिर ऐसे यारो से ? सुख दुःख भी जब बाँटने हो दीवारों से, ज़िस्म