होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे
होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे उसके लिए तू चाहे ये जहान छोड़ दे, कितनी उठाए हमने
General Poetry
होना नहीं अब उसने मेहरबान छोड़ दे उसके लिए तू चाहे ये जहान छोड़ दे, कितनी उठाए हमने
वो जो दिल के क़रीब होते है लोग वो भी अज़ीब होते है, पढ़ना लिखना जो जानते न
हम वक़्त ए मौत को तो हरगिज़ टाल न पाएँगे हम ख़ाली हाथ आए है और ख़ाली हाथ
हमने कैसे यहाँ गुज़ारी है अश्क खुनी है आह ज़ारी है, हम ही पागल थे जान दे बैठे
याद आता है मुझे छोड़ के जाने वाला मेरी हर शाम को रंगीन बनाने वाला, आज रो कर
मैंने माना कि तुम ज़ालिम नहीं हो मगर क्या मालूम था कि हम तुमसे डर जाएँगे, तेरी याद
बात करते है यहाँ क़तरे भी समन्दर की तरह अब लोग ईमान बदलते है कैलेंडर की तरह, कोई
क्यूँ रवा रखते हो मुझसे सर्द मेहरी बे सबब बीच में लाना पड़े थाना कचहरी बे सबब, मैंने
दुनियाँ में करने पड़ते है इतने समझौते कि मौत से पहले कई बार मर जाते है हम, ज़िन्दगी
बस इतनी बात पे बीबी खफ़ा है शौहर से कि माँ के हाथ पे ला कर दिहाड़ी रखता