मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है
मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है, हर
General Poetry
मिट्टी की सुराही है पानी की गवाही है उश्शाक़ नहीं हम लोग पर रंग तो काही है, हर
जब रात गए तेरी याद आई सौ तरह से जी को बहलाया कभी अपने ही दिल से बातें
वो इस अदा से जो आए तो क्यूँ भला न लगे हज़ार बार मिलो फिर भी आश्ना न
तेरी ज़ुल्फ़ों के बिखरने का सबब है कोई आँख कहती है तेरे दिल में तलब है कोई, आँच
किसी कली ने भी देखा न आँख भर के मुझे गुज़र गई जरस ए गुल उदास कर के
आराइश ए ख़याल भी हो दिलकुशा भी हो वो दर्द अब कहाँ जिसे जी चाहता भी हो, ये
शहर सुनसान है किधर जाएँ ख़ाक हो कर कहीं बिखर जाएँ रात कितनी गुज़र गई लेकिन इतनी हिम्मत
तुम आ गए हो तो क्यूँ इंतिज़ार ए शाम करें कहो तो क्यूँ न अभी से कुछ एहतिमाम
देख मोहब्बत का दस्तूर तू मुझ से मैं तुझ से दूर, तन्हा तन्हा फिरते हैं दिल वीराँ आँखें
कौन उस राह से गुज़रता है दिल यूँही इंतिज़ार करता है, देख कर भी न देखने वाले दिल