मुश्किल है कि अब शहर में निकले कोई घर से
मुश्किल है कि अब शहर में निकले कोई घर से दस्तार पे बात आ गई होती हुई सर
General Poetry
मुश्किल है कि अब शहर में निकले कोई घर से दस्तार पे बात आ गई होती हुई सर
है हकीक़त अज़ाब रहने दो टूट जाएगा ख़्वाब रहने दो, कब सज़ावार हूँ इनायत का यूँ ही ज़ेर
बहुत मुमकिन था हम दो जिस्म और एक जान हो जाते मगर दो जिस्म सिर्फ़ एक जान से
तू फूल की मानिंद न शबनम की तरह आ अब के किसी बेनाम से मौसम की तरह आ,
दुआ का टूटा हुआ हर्फ़ सर्द आह में है तेरी जुदाई का मंज़र अभी निगाह में है, तेरे
तेरी सूरत निगाहों में फिरती रहे इश्क़ तेरा सताए तो मैं क्या करूँ ? कोई इतना तो आ
एक सूरज था कि तारों के घराने से उठा आँख हैरान है क्या शख़्स ज़माने से उठा, किस
जुस्तुजू खोए हुओं की उम्र भर करते रहे चाँद के हमराह हर शब सफ़र करते रहे, रास्तों का
वो जो दिल में तेरा मुक़ाम है किसी और को वो देना नहीं, वो जो रिश्ता तुझ से
दिल की दुनिया में दुनिया न आये कभी मेरे मौला ये दुनिया न भाये कभी, जिस को क़ुरआँ